धर्मपन्नामध्यप्रदेशमध्यप्रदेश जनसंपर्क

माँ कलेही मंदिर पवई आस्था, परंपरा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम

1350 वर्ष प्राचीन मानी जाने वाली मां कलेही की प्रतिमा श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र

अजीत बड़ौलिया, पवई

मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की पवई तहसील में स्थित मां कलेही मंदिर धार्मिक आस्था, प्राचीन संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम है। विंध्य पर्वत श्रृंखला की तलहटी में पतने नदी के तट पर स्थित यह प्राचीन मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं की श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। पवई नगर से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित मां कलेही धाम में वर्षभर भक्तों का आगमन होता है, लेकिन शारदीय और चैत्र नवरात्र के दौरान यहां विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिलता है।अद्भुत प्रतिमा और प्राचीन धार्मिक विरासतमां कलेही की अष्टभुजाधारी प्रतिमा अपने विशिष्ट स्वरूप और शिल्पकला के लिए विशेष पहचान रखती है। मान्यताओं के अनुसार, यह प्रतिमा लगभग 1350 वर्ष प्राचीन है और इसकी स्थापना विक्रम संवत 700 में हुई थी। माता के हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म, तलवार और त्रिशूल सहित विभिन्न आयुध सुशोभित हैं। प्रतिमा में मां भगवती महिषासुर का मर्दन करती हुई दिखाई देती हैं। उनके चरणों के समीप भगवान शिव तथा दोनों ओर हनुमान जी और बटुक भैरव की उपस्थिति मंदिर की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाती है। मां कलेही को शक्ति और समृद्धि की प्रतीक मानकर भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह धाम केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का प्रतीक है।चैत्र नवरात्र का प्राचीन मेला, आकर्षण का केंद्रमां कलेही मंदिर में चैत्र नवरात्र के अवसर पर विशाल मेले का आयोजन होता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मेले की परंपरा लगभग 500 वर्ष पुरानी है। प्राचीन समय में यह मेला ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा था, जहां लोग वर्षभर की जरूरतों के लिए अनाज, तेल, मसाले और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी करते थे। वर्तमान में मेले में मीना बाजार, झूले, नाटक-नौटंकी और अन्य मनोरंजन के साधन लोगों को आकर्षित करते हैं। नवरात्र के दौरान आसपास के गांवों सहित दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और व्यापारी पहुंचते हैं। इससे स्थानीय व्यापार को भी बढ़ावा मिलता है।देश के विभिन्न अंचलों से पहुंचते हैं श्रद्धालुमां कलेही के दर्शन के लिए बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा, निमाड़ और महाकौशल सहित विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त माता के दरबार में मन्नत मांगते हैं और मनोकामना पूर्ण होने की कामना से पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर के समीप स्थित श्री हनुमान भाटे की सीढ़ियों पर श्रद्धालुओं के नाम और पते अंकित होने की परंपरा को भी इस धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है।लोक मान्यताओं में मां शारदा देवी मैहर, मां पद्मावती देवी पन्ना और मां कलेही देवी पवई का विशेष धार्मिक संबंध बताया जाता है। इन मान्यताओं के चलते भी श्रद्धालुओं के बीच मां कलेही धाम का विशिष्ट स्थान है।अखंड ज्योति और लाल चुनरी में बंधे श्रीफल की परंपरानवरात्र के नौ दिनों में मां कलेही के समक्ष अखंड ज्योति प्रज्वलित करने की परंपरा है। भक्त माता की आराधना करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना करते हैं। मंदिर परिसर की परिक्रमा में लाल चुनरी में बंधे हजारों श्रीफल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक हैं।मान्यता के अनुसार, भक्त अपनी मनोकामना लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं और श्रीफल को लाल चुनरी में बांधकर अपनी प्रार्थना अर्पित करते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर चुनरी खोलने की परंपरा भी प्रचलित है। यह परंपरा मंदिर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।कन्या भोज और नि:शुल्क भंडारे से मिलती है सेवा की प्रेरणानवरात्र के दौरान मां कलेही मंदिर परिसर में कन्या भोज और भंडारे का आयोजन विशेष महत्व रखता है। जनसहयोग और नगर के युवाओं के प्रयासों से पिछले लगभग 25 वर्षों से नि:शुल्क कन्या भोज एवं भंडारे की परंपरा संचालित होने की जानकारी दी जाती है। इस दौरान दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को भोजन-प्रसादी वितरित की जाती है।यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सहयोग, सेवा और सामूहिक सहभागिता का भी उदाहरण है। स्थानीय युवाओं और श्रद्धालुओं की भागीदारी से मंदिर परिसर में सेवा की भावना मजबूत होती है।जवारों की परंपरा बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचानमां कलेही धाम में नवरात्र के दौरान जवारों की परंपरा का विशेष महत्व रहा है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, एक समय मां मैहर की शारदा देवी, पन्ना की फूला माता और आसपास के लगभग डेढ़ सौ गांवों से जवारे मां कलेही धाम लाए जाते थे।भक्त सिर पर जवारे रखकर ढोल-मंजीरों की थाप पर पारंपरिक भक्ति गीत गाते हुए माता के दरबार पहुंचते थे। इस परंपरा से जुड़े कुछ पारंपरिक करतब भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। हालांकि, बदलते समय के साथ जवारों की यह प्राचीन परंपरा धीरे-धीरे सीमित होती दिखाई दे रही है। इसे सुरक्षित रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए सामाजिक संगठनों, स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं की सहभागिता आवश्यक है।मंदिर परिसर में शिवलिंग, हनुमान प्रतिमा और बाबा कैलाशी का आकर्षणमां कलेही मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के साथ अन्य धार्मिक स्थल भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। मुख्य द्वार के बाईं ओर श्री हनुमान जी महाराज की छह रुद्री प्रतिमा स्थापित बताई जाती है। परिसर में प्राचीन शिवलिंग भी विराजमान है, जो शिवभक्तों के लिए विशेष श्रद्धा का केंद्र है।विंध्य पर्वत की तलहटी में स्थापित लगभग 27 फीट ऊंची बाबा कैलाशी की शिव प्रतिमा भी यहां का प्रमुख आकर्षण है। प्रतिमा की जटाओं से गंगा प्रवाह का स्वरूप दर्शाया गया है। प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह स्थल युवाओं, श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण की जरूरतमंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में चंदेलकालीन मूर्तियों के अवशेष होने की जानकारी स्थानीय स्तर पर दी जाती है। ये अवशेष क्षेत्र के प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में इनकी पहचान, ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर जांच, सूचीकरण और संरक्षण की आवश्यकता है।पुरातत्व विभाग तथा संबंधित प्रशासनिक संस्थाओं को क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर का सर्वेक्षण कराकर उसके संरक्षण की दिशा में पहल करनी चाहिए, ताकि प्राचीन प्रतिमाओं और स्थापत्य अवशेषों को सुरक्षित रखा जा सके।धार्मिक पर्यटन के विकास की अपार संभावनाएंमां कलेही मंदिर का प्राकृतिक परिवेश, विंध्य पर्वत श्रृंखला की तलहटी, हरियाली और पतने नदी का तट इसे धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं। यदि मंदिर परिसर में स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, श्रद्धालुओं के लिए विश्राम स्थल, सुरक्षित आवागमन और अन्य मूलभूत सुविधाओं का विकास किया जाए, तो यहां आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव मिल सकता है।साथ ही, ऐतिहासिक एवं धार्मिक धरोहरों का व्यवस्थित संरक्षण और क्षेत्र का योजनाबद्ध विकास स्थानीय व्यापार, रोजगार और पर्यटन गतिविधियों को प्रोत्साहित कर सकता है। इससे पवई क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर अधिक पहचान मिलने की संभावना है।आस्था और विरासत को सहेजने की आवश्यकतामां कलेही मंदिर पवई की धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं, प्राचीन शिल्पकला और प्राकृतिक सौंदर्य का ऐसा संगम है, जो क्षेत्र की विशिष्ट पहचान बनाता है। मंदिर से जुड़ी प्राचीन मान्यताओं, जवारों की परंपरा, नवरात्र मेले और ऐतिहासिक अवशेषों को संरक्षित करना समय की आवश्यकता है। जनसहयोग, प्रशासनिक पहल और पुरातात्विक संरक्षण के माध्यम से इस धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button